पहले कौन चुने

मीरा के छोटे भाई-बहन हैं, गोलू और बनी। इस बार सब नाना-नानी के घर पर थे। केक एक ही था। गोलू ने चाकू उठा लिया। बनी अभी से नाराज़ थी।
मीरा को क्लास वाला केक याद आया। पिछली बार हल आसान था। चाकू उसे दे दो, जो केक खाएगा ही नहीं।
उसने कमरे में चारों ओर देखा। यहाँ हर किसी को टुकड़ा चाहिए था। न कोई और भाई-बहन, न कोई मौसी। चाकू थमाने के लिए कोई भी नहीं था। इस केक के लिए कोई और हल चाहिए था।
उसने पिछले हफ़्ते की क्लास वाली बात फिर सोची। वह हल इसलिए चला था, क्योंकि कोई एक झगड़े से बाहर था। वही चाकू पकड़ सकता था। यहाँ कोई भी बाहर नहीं था।
इस बार बात यह नहीं थी कि चाकू किसके हाथ में है। बात यह थी कि पहले कौन चुनता है।
मुख्य बात
देखो, क्या बदला। गोलू अब भी काटता है। पर पहला टुकड़ा अब बनी चुनती है, गोलू नहीं। बस यही एक अदला-बदली पूरा नियम है।
कुछ लोग पढ़ते हैं कि चीज़ें ठीक से कैसे बाँटी जाएँ। वे इसका फ़ायदा एक छोटे-से वाक्य में कहते हैं।
मुख्य बात
अच्छा नियम हो, तो जलन हो ही नहीं सकती।
जलन का मतलब है: अपने हिस्से की जगह किसी और का हिस्सा चाहना। मान लो, बनी ने पहले चुना। फिर भी वह सोचती, “काश गोलू वाला टुकड़ा मेरा होता।” तब केक का झगड़ा ख़त्म नहीं होता। अच्छा नियम वह है, जिसमें चुनने के बाद कोई अदला-बदली न चाहे। इसके लिए किसी को भला बनने की ज़रूरत नहीं। काम नियम करता है।
नियम इसीलिए होते हैं। वे किसी से भलाई नहीं माँगते। बस यह देखते हैं कि बारी सही हो।
नियम

अब यही नियम, नाम हटाकर। जो बाँटता है, वह पहले नहीं चुनता। एक काटता है। दूसरा पहले अपना हिस्सा चुनता है। जिसने काटा, उसे वही मिलता है जो बचा।
काटते समय गोलू को नहीं पता कि कौन-सा आधा उसका होगा। इसलिए उसकी भलाई इसी में है कि वह जितना हो सके, बराबर काटे। वह अच्छा बच्चा बनकर ऐसा नहीं कर रहा। वह बस सावधान है। बाहर से देखो, तो दोनों एक जैसे ही दिखते हैं।
अब गोलू की तरफ़ से सोचो। वह बराबर न काटे, तो बनी बड़ा आधा ले लेगी। छोटा आधा गोलू के हिस्से आएगा। वह बराबर काटे, तो बनी कोई भी आधा ले, गोलू को आधा ही मिलेगा। इस नियम में ध्यान से काटना ही गोलू के लिए सबसे अच्छा है।
लोग अक्सर क्या मानते हैं

मीरा ने नानाजी को केक की बात बताई। “किसी ईमानदार को बाँटने दो, बेटा,” उन्होंने कहा। “गोलू समझदार लड़का है। उस पर भरोसा करो। और कुछ करने की ज़रूरत नहीं।”
गोलू सच में ज़्यादातर दिन ईमानदार ही रहता था।
मीरा ने बहस नहीं की। वह बस सोचती रही। गोलू अपने लिए भी काट रहा है। तो बनी कैसे जाँचे कि दोनों आधे बराबर हैं? गोलू का इरादा कितना भी अच्छा हो, किसी के मन में शक रह ही जाएगा।
नए नियम में बनी को गोलू पर भरोसा करने की ज़रूरत ही नहीं। गोलू ने बराबर नहीं काटा, तो छोटा टुकड़ा उसी के हिस्से आएगा। वह कैसा भी लड़का हो।
वही बात, दो और बार

मीरा की रितु दीदी हॉस्टल में रहती हैं। उनके कमरे में दो और लड़कियाँ हैं। तीनों को खिड़की वाला बिस्तर चाहिए था। तीनों के पास अपनी-अपनी वजह थी।
किसी ने यह बहस नहीं की कि बिस्तर का सबसे ज़्यादा हक़ किसका है। किसी एक को फ़ैसला करने वाला भी नहीं बनाया गया। उन्होंने बारी तय कर ली: हर किसी का एक महीना। यह दीवार के कैलेंडर पर लिख दिया।
अब किसी को किसी की ईमानदारी पर भरोसा नहीं करना पड़ता। उस महीने कमरे में कोई भी हो, बारी अपने-आप आगे बढ़ जाती है।
बारी भी एक तरह से काटना ही है। साल केक है। कैलेंडर उसे बराबर बारियों में काट देता है। चाकू किसी के हाथ में नहीं है। तो कोई अपने लिए बड़ा टुकड़ा नहीं काट सकता।

फ़रहान, अदिति और प्रिया का प्रोजेक्ट देर से पूरा हुआ। उन्होंने मिलकर एक पिज़्ज़ा मँगाया। इस बार चाकू फ़रहान के पास था।
टुकड़े बाँटने के लिए कोई चौथा नहीं था। वे बस तीन ही थे। फ़रहान ने काटा। पहले अदिति ने एक टुकड़ा चुना, फिर प्रिया ने। फ़रहान ने सबसे आख़िर में लिया।
यह केक वाली ही बात है, बस तीन लोगों के लिए। किसी ने इसे कोई नाम नहीं दिया। काम करने के लिए नाम की ज़रूरत भी नहीं थी।
इसे पहचानो
नीचे दो नए मामले हैं। कौन-सी एक बात दोनों को समझा देती है?
1
दो भाइयों के बीच तरबूज़ का आख़िरी टुकड़ा बचा है। जो चाकू उठाता है, बड़ा आधा भी वही उठाता है। हर बार।
2
कुछ दोस्त मिलकर एक तोहफ़ा ख़रीदते हैं। पैसे बराबर नहीं बँटे। जिसने हिसाब लगाया, उसी ने अपने लिए सबसे कम पैसे रखे।
दोनों में एक जैसी बात ढूँढो। दोनों में, जो बाँट रहा था, पहले उसी ने चुना। हर बार यही होता है। बारी उलट दो, और देखो क्या बदलता है।
इस हफ़्ते, घर पर
घर में किसी को कुछ बाँटते हुए देखो: खाना, घर के काम, या टीवी और फ़ोन का समय। ध्यान दो कि पहले किसने चुना। क्या बाँटने वाला भी वही था? कुछ बोलना नहीं। बस ध्यान देना।
नाम
इस नियम का एक नाम भी है: एक काटे, दूसरा चुने (cut-and-choose)। बाँटने के तरीक़े पढ़ने वाले लोग इसे यही कहते हैं। “एक काटे” यानी कोई एक चीज़ को बाँटता है। “दूसरा चुने” यानी दूसरा पहले अपना हिस्सा चुनता है। दोनों को साथ रखो, तो पूरा नियम मिल जाता है। जो काटता है, वह पहले नहीं चुनता।
केक, बिस्तर, पिज़्ज़ा, तरबूज़। इसी एक नियम ने चारों झगड़े सुलझा दिए। और किसी पर भरोसा भी नहीं करना पड़ा।

एक नियम, तीन बँटवारे। एक केक, हॉस्टल का एक बिस्तर, एक पिज़्ज़ा। हर बार जिसने बाँटा, उसने पहले चुनने की बारी छोड़ दी, या सबसे आख़िर में लिया। किसी पर भरोसा नहीं करना पड़ा। काम बारी ने किया।
अच्छा नियम हो, तो जलन हो ही नहीं सकती। इसलिए ज़्यादा किसे मिले, इस पर बहस से पहले पूछो: पहले कौन चुन रहा है?
बहुत पहले शीलभद्र नाम के एक आचार्य एक बड़ा विद्यालय चलाते थे। किसी भी देश का कोई भी भिक्षु वहाँ पढ़ने आ सकता था। अंदर आने के लिए सबको द्वार पर एक जैसी बहस करनी होती थी। उस साल द्वार पर कौन बैठा है, नियम को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। मीरा के नियम को भी इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता था कि गोलू का मन अच्छा है या नहीं।
आगे यह कहाँ मिलेगा
अगले अध्याय में: हर चीज़ इतनी आसानी से नहीं बँटती। कभी-कभी एक चुनाव में कुछ ऐसा छूट जाता है, जो वापस नहीं मिलता। चुनाव सही हो, तब भी।